संकट: बदहाली का अंतहीन चक्र
विदर्भ और ओडिशा जैसे वर्षा-आधारित क्षेत्रों में कपास की खेती अब किसानों के लिए तबाही का पर्याय बन गई है। बेमौसम बारिश, भीषण गर्मी और महंगे रासायनिक इनपुट (बीज, खाद, कीटनाशक) के कारण किसान भारी कर्ज के जाल में फंस गए हैं। मोनो-क्रॉपिंग (एकल फसल प्रणाली) की बढ़ती लागत और बाजार में अनिश्चितता ने लाखों परिवारों को आर्थिक तंगी और आत्महत्या जैसे दुखद मोड़ों तक धकेल दिया है।
समाधान: कपास आधारित कृषि-वानिकी
इस आपदा से निकलने का एकमात्र रास्ता ‘कॉटन-बेस्ड एग्रोफॉरेस्ट्री’ है। इसमें किसान कपास की खेती के साथ-साथ खेत में पेड़, बांस, फलदार पौधे और चारे वाली प्रजातियां उगाते हैं।
यह क्यों प्रभावी है?
- आर्थिक सुरक्षा: अगर कपास की फसल खराब होती है, तो भी किसान को फलों, लकड़ी और बांस से आय मिलती रहती है।
- मिट्टी का कायाकल्प: पेड़ों की पत्तियां खाद बनकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं और नमी को लंबे समय तक रोककर रखती हैं।
- कीटनाशकों से छुटकारा: खेत में लगे पेड़ पक्षियों और मित्र कीटों के लिए आवास बनाते हैं, जो प्राकृतिक रूप से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को नियंत्रित करते हैं।
- जलवायु परिवर्तन से बचाव: पेड़ खेतों के तापमान को नियंत्रित करते हैं और लू के थपेड़ों से फसल को बचाते हैं।
सम्मान और आत्मनिर्भरता की राह
यह प्रणाली न केवल जमीन को उपजाऊ बनाती है, बल्कि ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा करती है। यह महिलाओं को मधुमक्खी पालन, फल प्रसंस्करण और चारे के प्रबंधन जैसे कार्यों में जोड़कर आर्थिक रूप से सशक्त बनाती है। सरकार और संस्थाओं को अब ऐसी नीतियों पर जोर देना चाहिए जो किसानों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करें और बाजार तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करें।
रसायन-आधारित खेती से हटकर विविध और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ना, आज के दौर में किसानों के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।

