भारतीय सड़कों पर एक मूक संकट
नई दिल्ली — जहां एक तरफ सड़क सुरक्षा से जुड़े राष्ट्रीय अभियान मुख्य रूप से मोटरसाइकिल चालकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वहीं दूसरी तरफ पीछे बैठने वाली सवारी (पिलियन राइडर) की सीट पर एक मूक और बेहद घातक संकट मंडरा रहा है। एम्स (AIIMS) दिल्ली, एमजीएम मेडिकल कॉलेज नवी मुंबई और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) सहित कई स्वतंत्र चिकित्सा और परिवहन अध्ययनों से मिले आंकड़े बताते हैं कि दोपहिया वाहनों के पीछे बैठने वाले लोग आज देश के सबसे असुरक्षित और उपेक्षित सड़क उपयोगकर्ता बन चुके हैं।
बीते कुछ वर्षों में वाहन चालकों के बीच हेलमेट के उपयोग में धीरे-धीरे सुधार देखा गया है, लेकिन पीछे बैठने वाली सवारियों के लिए सुरक्षा नियमों का पालन चिंताजनक रूप से बेहद कम है, जिससे रोजाना लाखों लोग जानलेवा सिर की चोटों के सीधे खतरे में रहते हैं।
हेलमेट अनुपालन में एक बड़ा अंतर
एम्स ट्रॉमा सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, इस केंद्र में आने वाले सड़क दुर्घटना के कुल घायलों में 53.97% मरीज दोपहिया वाहनों से जुड़े थे। इस संख्या के भीतर, मोटरसाइकिल या स्कूटर की पिछली सीट वाहन पर सांख्यिकीय रूप से सबसे असुरक्षित स्थान है।
चालक और यात्री के व्यवहार का सीधा तुलनात्मक डेटा सुरक्षा के इस बड़े अंतर को उजागर करता है:
- वाहन चालक: साल 2022 तक, दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले बिना हेलमेट के चालकों की संख्या घटकर 15.42% पर आ गई थी।
- पीछे बैठने वाले (पिलियन राइडर्स): बिना हेलमेट के सफर करने वाले यात्रियों का आंकड़ा आज भी 41.12% पर अटका हुआ है, जिसमें नाममात्र का सुधार हुआ है।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक तरफ चालक धीरे-धीरे सुरक्षा की आदतें सीख रहा है, वहीं यात्री को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया गया है। यही कारण है कि आज ट्रॉमा सेंटरों में आने वाले गंभीर मरीजों में 43.8% लोग बिना हेलमेट के पीछे बैठने वाले यात्री होते हैं।
जिंदगी और मौत का फर्क: 100% उत्तरजीविता बनाम शून्य सुरक्षा
‘एशियन जर्नल ऑफ न्यूरोसर्जरी’ (2025) में माग्रे व अन्य द्वारा प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में गंभीर सिर की चोटों के साथ अस्पताल में भर्ती हुए 120 पिलियन राइडर्स का विश्लेषण किया गया। यह क्लिनिकल डेटा एक दुर्घटना के दौरान बिना हेलमेट के यात्री के सिर पर होने वाले भयानक असर को दर्शाता है:
- ब्रेन कंट्यूशन (मस्तिष्क की अंदरूनी चोट): 69.2% मामलों में पाया गया।
- खोपड़ी का फ्रैक्चर (Skull Fractures): 68.3% मरीजों में देखा गया।
- सबरैक्नॉइड हैमरेज (दिमाग के अंदर ब्लीडिंग): 59.2% पीड़ितों को भुगतना पड़ा।
- सबड्यूरल हैमरेज (खून का थक्का जमना): 50% मामलों में दर्ज किया गया।
इस अध्ययन के तहत भर्ती मरीजों में मृत्यु दर 35.8% थी, और सभी मौतें मस्तिष्क की गंभीर चोट (Craniocerebral Injury) के कारण हुईं।
हालांकि, इस अध्ययन का सबसे निर्णायक निष्कर्ष हेलमेट के महत्व को साबित करता है: इन 120 पिलियन राइडर्स में से केवल 8 लोग दुर्घटना के समय हेलमेट पहने हुए थे—और उनमें से प्रत्येक व्यक्ति जीवित बच गया (मृत्यु दर 0%)। इसके विपरीत, बिना हेलमेट वाले यात्रियों में मरने की दर तीन में से एक से अधिक (35% से ज्यादा) थी।
इसके बावजूद, अध्ययन में सामने आया कि कुल मिलाकर केवल 6.7% पिलियन राइडर ही हेलमेट पहनते हैं। शोधकर्ताओं ने रेखांकित किया कि भारत में कानून तो मौजूद है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार देश का हेलमेट-कानून प्रवर्तन (Enforcement) स्कोर 10 में से केवल 4 है।
जेंडर रिस्क: साइड-सैडल (एक तरफ पैर रखकर) बैठने वाली महिलाओं पर दोगुना खतरा
पारंपरिक पहनावे (जैसे साड़ी या सूट) और सामाजिक आदतों के कारण भारत में यह संकट महिलाओं के लिए और भी अधिक जानलेवा बन जाता है। देश में लगभग 73.5% महिला पिलियन राइडर ‘साइड-सैडल’ स्थिति में यात्रा करती हैं (यानी मोटरसाइकिल पर दोनों पैर एक तरफ रखकर बैठना)।
चिकित्सा डेटा स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है कि साइड-सैडल बैठने की मुद्रा और हेलमेट न होना मिलकर एक अत्यंत खतरनाक स्थिति पैदा करते हैं:
- क्रॉस-सैडल (दोनों तरफ पैर फैलाकर बैठना) मृत्यु दर: 23.1% (मुख्य रूप से पुरुष यात्री)।
- साइड-सैडल (एक तरफ पैर रखकर बैठना) मृत्यु दर: 47.2% (मुख्य रूप से महिला यात्री)।
साइड-सैडल बैठने से अचानक होने वाली दुर्घटना के समय शरीर का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है और यात्री खुद को संभालने या झटके को रोकने में असमर्थ हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप, साइड-सैडल दुर्घटना का शिकार होकर अस्पताल पहुंचने वाली प्रत्येक दो महिलाओं में से लगभग एक महिला की मौत हो गई। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि साइड-सैडल बैठने की इस मुद्रा को सक्रिय रूप से हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
सख्त नीतिगत बदलावों की आवश्यकता
अस्पतालों के इन डरावने आंकड़ों की पुष्टि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय डेटा से भी होती है। भारत में होने वाली कुल सड़क दुर्घटना मौतों में 44.8% हिस्सेदारी दोपहिया वाहन उपयोगकर्ताओं की है, जिसमें 18 से 45 वर्ष के युवा (जो महिला यात्रियों का मुख्य आयु वर्ग है) कुल मौतों का 66.4% हिस्सा हैं। मंत्रालय की रिपोर्ट सुरक्षा गियर की उपेक्षा—विशेष रूप से हेलमेट न पहनने को—घातक दुर्घटनाओं के मुख्य कारणों में से एक मानती है।
एम्स और न्यूरोसर्जरी विभागों के ये संयुक्त आंकड़े चेतावनी देते हैं कि भारत में दोपहिया वाहनों की पिछली सीट एक डेंजर ज़ोन बन चुकी है। इस संकट को दूर करने के लिए केवल कागजी कानून काफी नहीं हैं; इसके लिए सड़कों पर सख्त पुलिस चेकिंग, महिलाओं के लिए हेलमेट की अनिवार्यता को लेकर सामाजिक जागरूकता और सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले एक बड़े व्यावहारिक बदलाव की तत्काल आवश्यकता है।

