तृणमूल कांग्रेस में ऐतिहासिक संकट: 60 विधायकों की बगावत के बाद संसद में भी फूट तय; ममता बनर्जी के सामने अस्तित्व की लड़ाई

Tmc Mamata Abhishek Banerjee
Tmc Mamata Abhishek Banerjee (PC: Social Media Sites)

कोलकाता / नई दिल्ली — तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने 28 साल के इतिहास के सबसे भीषण आंतरिक संकट से गुजर रही है। पश्चिम बंगाल में पार्टी के 80 नवनिर्वाचित विधायकों में से 60 द्वारा खुली बगावत करने के बाद, अब नई दिल्ली में पार्टी के संसदीय दल (संसद सदस्यों) में भी बड़ी फूट पड़ना तय माना जा रहा है।

यह राजनीतिक भूचाल ऐसे समय में आया है जब पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी 8 जून को विपक्षी गठबंधन (I.N.D.I.A. bloc) की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली जाने वाली हैं।

दलबदल कानून और सांसदों का गणित

संसद में टीएमसी के पास वर्तमान में लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत अयोग्यता से बचने के लिए, बागी गुट को दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। इसका मतलब है कि बागियों को लोकसभा में कम से कम 20 सांसद और राज्यसभा में 9 सांसद अपने पाले में करने होंगे।

टीएमसी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने शुक्रवार को पार्टी की स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा:

“मैंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में इतनी कम अवधि में लगभग 60 विधायकों को एक साथ पार्टी छोड़ते हुए कभी नहीं देखा। मेरा मानना है कि ऐसी ही प्रतिक्रिया लोकसभा में भी देखने को मिल सकती है।”

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी के कम से कम 20 लोकसभा सांसद पहले से ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व के सीधे संपर्क में हैं, जिसकी पुष्टि खुद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने भी की है।

कानूनी लड़ाई और समानांतर नेतृत्व का दावा

निष्कासित नेताओं ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के नेतृत्व में शुरू हुए इस विद्रोह ने राज्य विधानसभा को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। एक बड़े प्रशासनिक घटनाक्रम में, पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता (LoP) के रूप में आधिकारिक मान्यता दे दी है। इसके साथ ही अखरुज्जमां को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) और जावेद खान व सबीना यास्मिन जैसे वरिष्ठ नेताओं को उपनेता नियुक्त किया गया है।

इसके जवाब में, ममता बनर्जी ने शुक्रवार शाम अपने कालीघाट आवास पर राष्ट्रीय कार्यसमिति की एक आपातकालीन बैठक बुलाई, जिसमें उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी, सांसद कल्याण बनर्जी और कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम शामिल हुए। बैठक के बाद कल्याण बनर्जी ने एलान किया कि टीएमसी सोमवार (8 जून) को कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख करेगी और स्पीकर द्वारा बागी गुट को दी गई मान्यता को कानूनी चुनौती देगी।

नेताओं का इस्तीफा और बढ़ता असंतोष

टीएमसी में यह असंतोष केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। बारासात से चार बार की लोकसभा सांसद और ममता बनर्जी की बेहद करीबी मानी जाने वाली डॉ. काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देकर नेतृत्व को बड़ा झटका दिया है। मुख्य सचेतक के पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने पार्टी के भीतर संस्थागत भ्रष्टाचार और गलत कामकाज के तरीकों पर गहरी नाराजगी व्यक्त की।

यहाँ तक कि ममता गुट के संकटमोचक माने जाने वाले कल्याण बनर्जी ने भी माना है कि पार्टी के भीतर गहरा डर और असंतोष है। उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि ममता बनर्जी द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान कई भ्रष्ट प्रथाओं को नजरअंदाज करना ही इस बड़े विद्रोह का मुख्य कारण बना है। हालांकि ममता बनर्जी का खेमा ग्रामीण और अल्पसंख्यक विधायकों को वापस अपने पाले में लाने के लिए लगातार फोन कर रहा है, लेकिन बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वे ही अब विधानसभा में “असली” तृणमूल हैं और पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

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